भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं संवैधानिक विकास (1885-1950)

गहन प्रशासनिक विश्लेषण, कार्य-कारण सम्बन्ध एवं परीक्षक दृष्टिकोण सहित आरएएस मुख्य परीक्षा विशेष टॉपर नोट्स

कड़ी 01 • वर्ष 1885

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

क्यों हुआ (पृष्ठभूमि): 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीयों में पनप रहे असंतोष को एक वैधानिक मंच देना अनिवार्य हो गया था। ब्रिटिश सरकार एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस कर रही थी जो भारतीयों के गुस्से को हिंसक क्रांति में बदलने से रोक सके (सेफ्टी वाल्व सिद्धांत)।

कैसे हुआ (घटनाक्रम): 28 दिसंबर 1885 को बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम के प्रयासों से 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' की स्थापना हुई[cite: 8]। इसके प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी बने[cite: 8]।

किसने किया (मुख्य सूत्रधार): ए.ओ. ह्यूम (संस्थापक), व्योमेश चंद्र बनर्जी (प्रथम अध्यक्ष), और देश भर से आए कुल 72 प्रबुद्ध प्रतिनिधि[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा (परिणाम): इसने बिखरे हुए क्षेत्रीय आंदोलनों को एक अखिल भारतीय मंच प्रदान किया, जिससे संगठित राष्ट्रवाद का जन्म हुआ[cite: 8]।

📝 परीक्षक कुंजी (GS-1 Mains): शुरुआती दौर (1885-1905) को 'उदारवादी चरण' कहा जाता है, जिसकी नीति 'प्रार्थना, याचिका और प्रतिवाद' (3Ps) पर आधारित थी[cite: 8]। इसे ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास का युग माना जाता है[cite: 8]।
कड़ी 02 • वर्ष 1905

बंगाल का विभाजन (बंग-भंग)

क्यों हुआ: बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रवाद और राजनीतिक चेतना का मुख्य केंद्र बन चुका था[cite: 8]। हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़कर राष्ट्रवाद को कुचलना अंग्रेजों का मुख्य प्रशासनिक लक्ष्य था[cite: 8]।

कैसे हुआ: तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने जुलाई 1905 में विभाजन की घोषणा की, जो 16 अक्टूबर 1905 को प्रभावी हुई[cite: 8]। विभाजन को 'प्रशासकीय सुविधा' का नाम दिया गया, परंतु विभाजन धार्मिक आधार पर (पूर्वी मुस्लिम बहुल और पश्चिमी हिंदू बहुल बंगाल) किया गया था[cite: 8]।

किसने किया: लॉर्ड कर्जन (मुख्य विलन)[cite: 8]। इसके विरोध में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कृष्ण कुमार मित्र और रवींद्रनाथ टैगोर ने मोर्चा संभाला[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन और 'बहिष्कार' का जन्म हुआ[cite: 8]। 16 अक्टूबर को पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' और 'राखी दिवस' (हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक स्वरूप) के रूप में मनाया गया[cite: 8]। इस घटना ने कांग्रेस के भीतर गरम दल के उदय का मार्ग प्रशस्त किया[cite: 8]।

कड़ी 03 • वर्ष 1906

मुस्लिम लीग की स्थापना

क्यों हुआ: स्वदेशी आंदोलन से घबराई ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच की खाई को स्थायी बनाने के लिए मुस्लिम संभ्रांत वर्ग को अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनाई[cite: 8]।

कैसे हुआ: 30 दिसंबर 1906 को ढाका में आयोजित एक बैठक में 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग' के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया[cite: 8]। लीग का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी प्रदर्शित करना और मुस्लिम हितों की रक्षा के बहाने कांग्रेस का विरोध करना था[cite: 8]।

किसने किया: ढाका के नवाब सलीमुल्लाह (मुख्य प्रस्तावक), आगा खाँ (प्रथम स्थाई अध्यक्ष) और नवाब मोहसिन-उल-मुल्क[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में संस्थागत सांप्रदायिकता (Institutional Communalism) की शुरुआत हुई, जिसने भविष्य में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) और भारत के विभाजन का आधार तैयार किया[cite: 8]।

कड़ी 04 • वर्ष 1907

सूरत विभाजन (कांग्रेस का ऐतिहासिक बिखराव)

क्यों हुआ: बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के तौर-तरीकों को लेकर मतभेद गहरा गया था[cite: 8]। नरम दल आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित रखना चाहता था, जबकि गरम दल इसे पूरे देश में फैलाकर 'पूर्ण स्वराज' की मांग करना चाहता था[cite: 8]।

कैसे हुआ: सूरत में ताप्ती नदी के तट पर आयोजित अधिवेशन में अध्यक्ष पद के चयन को लेकर दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई और अंततः जूता-लात चलने तक की नौबत आ गई[cite: 8]। इसके बाद गरम दल को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया[cite: 8]।

किसने किया: नरम दल का नेतृत्व रास बिहारी घोष (जिन्हें अध्यक्ष बनाया गया) और फिरोजशाह मेहता कर रहे थे, जबकि गरम दल के सूत्रधार लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) थे[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: कांग्रेस के बिखरने से राष्ट्रीय आंदोलन आगामी एक दशक के लिए पूरी तरह धीमा पड़ गया[cite: 8]। अंग्रेजों को दमन चक्र चलाने का खुला अवसर मिल गया और उन्होंने तिलक को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष के लिए मांडले जेल (म्यांमार) भेज दिया[cite: 8]।

कड़ी 05 • वर्ष 1909

मॉर्ले-मिण्टो सुधार (भारत परिषद अधिनियम, 1909)

क्यों हुआ: सूरत विभाजन से कमजोर हुई कांग्रेस और मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद अंग्रेजों ने भारतीय राजनीतिक असंतोष को शांत करने के लिए संवैधानिक सुधारों का लॉलीपॉप दिया[cite: 8]।

कैसे हुआ: भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले और वायसराय लॉर्ड मिण्टो के नाम पर यह अधिनियम पारित हुआ[cite: 8]। इसके तहत केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार तो किया गया, परंतु वास्तविक शक्तियां अंग्रेजों के पास ही रहीं[cite: 8]।

किसने किया: लॉर्ड मॉर्ले और लॉर्ड मिण्टो (जिन्हें 'भारत में सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक' कहा जाता है)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इस अधिनियम ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति (Separate Electorate) की शुरुआत की[cite: 8]। इस व्यवस्था ने राष्ट्रीय एकता पर गहरा आघात किया[cite: 8]। मॉर्ले ने मिण्टो को लिखे पत्र में सही कहा था: "हम नाग के दाँत बो रहे हैं, जिसकी फसल बहुत कड़वी होगी"[cite: 8]।

कड़ी 06 • वर्ष 1915

गांधी का भारत आगमन (एक नए युग का सूत्रपात)

क्यों हुआ: दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ 'सत्याग्रह' और 'अहिंसा' के सफल प्रयोगों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी ने भारत की सेवा करने का निर्णय लिया[cite: 8]।

कैसे हुआ: 9 जनवरी 1915 को गांधी स्थाई रूप से भारत (बंबई के अपोलो बंदरगाह पर) लौटे[cite: 8]। भारत आते ही उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर सक्रिय राजनीति में कूदने के बजाय एक वर्ष तक पूरे भारत का भ्रमण कर यहाँ की परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन किया[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जो अब तक केवल उच्च शिक्षित और शहरी मध्यम वर्ग तक सीमित था, उसमें आम जनता, गरीब किसानों, मजदूरों और महिलाओं के जुड़ने की पृष्ठभूमि तैयार हुई[cite: 8]। इसे राष्ट्रीय आंदोलन के 'गांधीवादी चरण' की शुरुआत माना जाता है[cite: 8]।

कड़ी 07 • वर्ष 1916

लखनऊ पैक्ट (कांग्रेस-लीग समझौता)

क्यों हुआ: प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुर्की के प्रति ब्रिटिश नीतियों से भारतीय मुस्लिम असंतुष्ट थे, जिससे लीग कांग्रेस के करीब आने लगी थी[cite: 8]। साथ ही, नरम और गरम दल भी महसूस कर रहे थे कि अलग रहकर वे अंग्रेजों का मुकाबला नहीं कर सकते[cite: 8]।

कैसे हुआ: अंबिका चरण मजूमदार की अध्यक्षता में लखनऊ में ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ[cite: 8]। बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के प्रयासों से नरम और गरम दल पुनः एक हो गए[cite: 8]। इसी मंच पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक समझौता हुआ जिसे 'लखनऊ पैक्ट' कहा जाता है[cite: 8]।

किसने किया: बाल गंगाधर तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना (जो उस समय हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत कहे जाते थे)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: अल्पकालिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक मजबूत संयुक्त मोर्चा तैयार हुआ[cite: 8]। परंतु, इस समझौते में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की 'पृथक निर्वाचन' की सांप्रदायिक मांग को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया, जिसे इतिहासकार कांग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल मानते हैं[cite: 8]।

कड़ी 08 • वर्ष 1917

चम्पारण सत्याग्रह (भारत में प्रथम गांधीवादी प्रयोग)

क्यों हुआ: बिहार के चम्पारण में यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा गरीब किसानों को अपनी भूमि के $3/20$ भाग पर नील की खेती करने के लिए विवश किया जाता था (तीनकठिया पद्धति)[cite: 8]। रासायनिक रंगों के आविष्कार के बाद नील की मांग गिर गई, परंतु गोरे जमींदार किसानों को इस अनुबंध से मुक्त करने के एवज में भारी अवैध कर वसूल रहे थे[cite: 8]।

कैसे हुआ: स्थानीय किसान नेता राजकुमार शुक्ल के बार-बार आग्रह करने पर गांधी जी चम्पारण पहुँचे[cite: 8]। ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें चम्पारण छोड़ने का आदेश दिया, जिसे गांधी ने सविनय अवज्ञा करते हुए मानने से इनकार कर दिया[cite: 8]। अंततः सरकार को एक जांच कमेटी बनानी पड़ी, जिसने तीनकठिया पद्धति को समाप्त किया और वसूले गए धन का 25% किसानों को वापस दिलाया[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी और अनुग्रह नारायण सिन्हा[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: यह भारत में गांधी का पहला सफल सत्याग्रह सिद्ध हुआ[cite: 8]। किसानों का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटा और इसी आंदोलन की सफलता से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधी जी को 'महात्मा' की उपाधि दी[cite: 8]।

कड़ी 09 • वर्ष 1918

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन

क्यों हुआ: अहमदाबाद में प्लेग की महामारी खत्म होने के बाद मिल मालिकों ने मजदूरों को दिया जाने वाला 'प्लेग बोनस' (जो वेतन का लगभग 50-70% था) अचानक बंद करने का निर्णय लिया, जबकि विश्व युद्ध के कारण महंगाई चरम पर थी[cite: 8]।

कैसे हुआ: मिल मालिकों ने केवल 20% बोनस देने की घोषणा की, जबकि मजदूर 35% की मांग कर रहे थे[cite: 8]। गांधी जी ने मिल मालिकों (जो उनके मित्र भी थे) के खिलाफ मजदूरों को अहिंसक हड़ताल पर जाने को कहा[cite: 8]। जब मजदूर टूटने लगे, तो गांधी ने दबाव बनाने के लिए भारत में अपनी पहली भूख हड़ताल (Hunger Strike) शुरू की[cite: 8]। तीसरे दिन मिल मालिक झुक गए और मामला ट्रिब्यूनल को सौंपा गया, जिसने 35% बोनस देने का फैसला सुनाया[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी और मिल मालिक अंबालाल साराभाई की बहन अनुसूया बेन (जिन्होंने मजदूरों का साथ दिया)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: औद्योगिक विवादों के समाधान में 'अहिंसक भूख हड़ताल' एक अचूक हथियार के रूप में स्थापित हुई और शहरी श्रमिक वर्ग गांधीवादी विचारधारा से मजबूती से जुड़ गया[cite: 8]।

कड़ी 10 • वर्ष 1918

खेड़ा सत्याग्रह

क्यों हुआ: गुजरात का समृद्ध कृषि क्षेत्र खेड़ा जिला वर्ष 1917-18 में अकाल, कम वर्षा और प्लेग के कारण फसल बर्बादी झेल रहा था[cite: 8]। ब्रिटिश राजस्व नियमों के अनुसार यदि उत्पादन सामान्य से 25% से कम हो तो लगान पूरी तरह माफ होना चाहिए था, परंतु ब्रिटिश अधिकारी जबरन कर वसूली कर रहे थे क्योंकि कर ही उनकी आय का मुख्य स्रोत था[cite: 8]।

कैसे हुआ: किसानों ने गांधी से गुहार लगाई[cite: 8]। गांधी ने पहले स्वतंत्र जांच करवाई और तथ्यों को सही पाकर किसानों से 'कर न देने' (टैक्स असहयोग) की प्रतिज्ञा करवाई[cite: 8]। सरकार ने दमन चक्र चलाया, मवेशी और जमीनें कुर्क कीं[cite: 8]। अंततः ब्रिटिश सरकार को गुप्त आदेश जारी करना पड़ा कि लगान केवल समर्थ किसानों से ही वसूला जाए[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी (रणनीतिकार) और वल्लभभाई पटेल, जिन्होंने अपनी वकालत छोड़कर गाँव-गाँव जाकर संगठन खड़ा किया[cite: 8]। साथ में इंदुलाल याज्ञिक और मोहनलाल पांड्या भी सक्रिय रहे[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: यह गांधी और पटेल की पहली बड़ी संयुक्त संगठनात्मक विजय थी[cite: 8]। किसानों के भीतर से सरकार का डर हमेशा के लिए खत्म हो गया और यहीं से वल्लभभाई पटेल को 'किसानों के राष्ट्रीय नेता' के रूप में Turning Point मिला[cite: 8]।

कड़ी 11 • वर्ष 1919

रॉलेट एक्ट एवं जलियांवाला बाग हत्याकांड

क्यों हुआ: प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने वादे के अनुसार रियायतें देने के बजाय भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और दबी हुई आवाज को कुचलने के लिए एक अत्यंत क्रूर कानून लाने का मन बनाया[cite: 8]।

कैसे हुआ: मार्च 1919 में सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश पर 'अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम' पारित हुआ, जिसे जनता ने "बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील" का काला कानून कहा[cite: 8]। इसके तहत किसी भी संदेहात्मक भारतीय को बिना मुकदमा चलाए 2 वर्ष के लिए जेल में डाला जा सकता था[cite: 8]। इस कानून के विरोध में पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं (डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल) की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी का दिन) को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण जनसभा आयोजित हुई, जिस पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी दिए मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए[cite: 8]।

किसने किया: सर सिडनी रॉलेट (कानून निर्माता) और क्रूर सैन्य अधिकारी जनरल डायर[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इस नरसंहार ने ब्रिटिश न्यायप्रियता के मुखौटे को पूरी तरह नोच फेंका[cite: 8]। इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'नाइटहुड' (Knighthood) की उपाधि और गांधी ने 'कैसर-ए-हिंद' का पदक ब्रिटिश सरकार को वापस लौटा दिया[cite: 8]। पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नफरत की लहर दौड़ गई[cite: 8]।

कड़ी 12 • वर्ष 1920

असहयोग आंदोलन (प्रथम अखिल भारतीय जन-आंदोलन)

क्यों हुआ: रॉलेट एक्ट का दमन, जलियांवाला बाग का घाव, हंटर कमेटी की लीपापोती और तुर्की के खलीफा को अपमानित किए जाने से उत्पन्न 'खिलाफत आंदोलन' के असंतोष को गांधी जी ने एक स्वर्णिम अवसर माना, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों को एक साझा दुश्मन (ब्रिटिश हुकूमत) के खिलाफ खड़ा किया जा सकता था[cite: 8]।

कैसे हुआ: 1 अगस्त 1920 को आंदोलन का औपचारिक प्रारंभ हुआ (इसी दिन उग्र राष्ट्रवाद के प्रणेता बालगंगाधर तिलक का निधन हुआ, जिसके बाद गांधी कांग्रेस के निर्विवाद नेता बने)[cite: 8]। दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस का पुनर्गठन कर इसकी सदस्यता फीस मात्र 4 आना (25 पैसे) कर दी गई और प्रांतीय समितियां भाषाई आधार पर बनाई गईं, ताकि यह आम जनता का संगठन बन सके[cite: 8]। आंदोलन के दो पहलू थे: नकारात्मक (उपाधियों, अदालतों, सरकारी स्कूलों और विदेशी कपड़ों का पूर्ण बहिष्कार) तथा सकारात्मक (खादी का प्रचार, चरखे को अपनाना, राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना)[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी (सर्वोच्च नेता), अली बंधु (मुस्लिम समर्थन हेतु), सी.आर. दास (बंगाल), मोतीलाल नेहरू (उत्तर भारत), राजेंद्र प्रसाद (बिहार), और वल्लभभाई पटेल (गुजरात)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: यह भारतीय इतिहास का पहला वास्तविक 'मास मूवमेंट' (जन आंदोलन) बना जिसने गाँवों तक ब्रिटिश सत्ता की वैधता को हिला दिया[cite: 8]। विदेशी कपड़ों के आयात में भारी गिरावट आई और चरखा आर्थिक स्वतंत्रता का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया[cite: 8]।

कड़ी 13 • वर्ष 1922

चौरी-चौरा कांड एवं असहयोग आंदोलन की आकस्मिक वापसी

क्यों हुआ: आंदोलन अभूतपूर्व रूप से फैल रहा था, परंतु देश के सभी हिस्सों में भीड़ उतनी अनुशासित और अहिंसक नहीं रह पा रही थी जितनी गांधी की रणनीति की मांग थी[cite: 8]।

कैसे हुआ: 5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर असहयोग आंदोलन के स्वयंसेवकों का एक शांतिपूर्ण जुलूस निकल रहा था[cite: 8]। स्थानीय पुलिस के लाठीचार्ज और दमन से क्रुद्ध होकर अनियंत्रित भीड़ ने पुलिस थाने को चारों तरफ से घेरकर आग लगा दी[cite: 8]। इस हिंसक घटना में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए[cite: 8]। गांधी जी इस हिंसा की खबर से अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने इसे अपनी "हिमालय जैसी भूल" मानते हुए 12 फरवरी 1922 को बारडोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर आंदोलन को तुरंत वापस लेने की घोषणा कर दी[cite: 8]।

किसने किया: स्थानीय उत्तेजित भीड़ (प्रदर्शनकारी) और महात्मा गांधी (जिन्होंने आंदोलन वापस लिया)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: पूरे देश में और कांग्रेस के भीतर घोर निराशा और आक्रोश फैल गया[cite: 8]। सुभाष चंद्र बोस ने लिखा कि "जब जनता का उत्साह चरम पर था, तब आंदोलन को वापस लेना एक राष्ट्रीय दुर्भाग्य था"[cite: 8]। जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू भी इस निर्णय से स्तब्ध रह गए[cite: 8]। इस शून्यता का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने मार्च 1922 में गांधी जी को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर 6 वर्ष की कठोर सजा सुना दी[cite: 8]।

कड़ी 14 • वर्ष 1923

स्वराज पार्टी की स्थापना (संसदीय मोर्चे पर संघर्ष)

क्यों हुआ: गांधी के जेल जाने और असहयोग आंदोलन के बंद होने से राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा था[cite: 8]। इस शून्यता को भरने और आंदोलन को जिंदा रखने के लिए रणनीति में बदलाव आवश्यक था[cite: 8]।

कैसे हुआ: कांग्रेस के भीतर दो गुट बन गए: 'नो-चेंजर्स' (राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल) जो चुनाव का बहिष्कार कर केवल रचनात्मक कार्यों (चरखा, खादी) के पक्ष में थे; और 'प्रो-चेंजर्स' जो 1919 के अधिनियम के तहत होने वाले चुनावों में भाग लेकर विधानसभाओं के भीतर प्रवेश करना चाहते थे[cite: 8]। उनका प्रसिद्ध नारा था: "परिषदों में जाओ और भीतर से व्यवस्था को नष्ट कर दो" (Enter the councils to wreck them from within)[cite: 8]। दिसंबर 1922 के गया अधिवेशन में प्रस्ताव गिर जाने के बाद, प्रो-चेंजर्स ने कांग्रेस के भीतर ही 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में 'कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी' की स्थापना की[cite: 8]।

किसने किया: चित्तरंजन दास (सी.आर. दास - अध्यक्ष) और मोतीलाल नेहरू (सचिव)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: 1923 के चुनावों में स्वराज पार्टी को मध्य प्रांत और बंगाल में भारी सफलता मिली[cite: 8]। वर्ष 1925 में विट्ठलभाई पटेल का केंद्रीय विधानसभा का पहला भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) चुना जाना इनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक विजय थी[cite: 8]। इन्होंने बजटीय प्रस्तावों को रोककर ब्रिटिश सरकार की तानाशाही को संसद के भीतर बेनकाब किया[cite: 8]। 1925 में सी.आर. दास की मृत्यु के बाद यह पार्टी कमजोर हो गई[cite: 8]।

कड़ी 15 • वर्ष 1927

साइमन कमीशन का गठन (श्वेत आयोग का संकट)

क्यों हुआ: 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम में यह विधिक प्रावधान था कि 10 वर्ष बाद (अर्थात 1929 में) एक संवैधानिक आयोग भारत भेजा जाएगा जो संवैधानिक प्रगति की समीक्षा करेगा[cite: 8]। परंतु ब्रिटेन में सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी को डर था कि यदि आगामी चुनावों में लेबर पार्टी जीत गई, तो वह भारत को अधिक रियायतें दे देगी[cite: 8]। इसलिए उन्होंने दो वर्ष पूर्व ही आयोग का गठन कर दिया[cite: 8]।

कैसे हुआ: 8 नवंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में 7-सदस्यीय आयोग की घोषणा की[cite: 8]। इस आयोग की सबसे बड़ी और विवादित विशेषता यह थी कि इसमें एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था[cite: 8]। भारत के भविष्य का फैसला केवल अंग्रेज करेंगे, इसे भारतीयों ने राष्ट्रीय आत्मसम्मान पर सीधा आघात माना[cite: 8]।

किसने किया: ब्रिटिश प्रधानमंत्री और जॉन साइमन (अध्यक्ष)[cite: 8]। इसके विरोध में कांग्रेस, जिन्ना गुट की मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इसके विरोध ने सोए हुए राष्ट्रीय आंदोलन को पुनः उग्र और सक्रिय बना दिया[cite: 8]। पहली बार सभी राजनीतिक दल 'श्वेत आयोग' के पूर्ण बहिष्कार के लिए एक मंच पर आ गए, जिसने आगामी सविनय अवज्ञा आंदोलन का जनाधार तैयार किया[cite: 8]।

कड़ी 16 • वर्ष 1928

नेहरू रिपोर्ट (प्रथम स्वदेशी संवैधानिक प्रारूप)

क्यों हुआ: जब 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत (बंबई) पहुँचा, तो देशव्यापी हड़तालें हुईं और "Simon Go Back" के नारे गूंजे[cite: 8]। लाहौर में शांतिपूर्ण विरोध का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय (पंजाब के सरे) पर ब्रिटिश पुलिस कमिश्नर स्कॉट के आदेश पर क्रूर लाठीचार्ज हुआ, जिससे 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया[cite: 8]। उनकी मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह और एचएसआरए ने सॉन्डर्स की हत्या कर दी[cite: 8]। इस देशव्यापी अशांति के बीच भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीयों को चुनौती दी कि "तुम लोग केवल विरोध करना जानते हो, यदि तुममें क्षमता है तो एक ऐसा संविधान बनाकर दिखाओ जिस पर भारत के सभी दल सहमत हों"[cite: 8]।

कैसे हुआ: इस चुनौती को स्वीकार करते हुए दिल्ली और बंबई में सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference) बुलाया गया[cite: 8]। संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक 9-सदस्यीय समिति बनाई गई, जिसने अगस्त 1928 में अपनी ऐतिहासिक 'नेहरू रिपोर्ट' प्रस्तुत की[cite: 8]।

किसने किया: मोतीलाल नेहरू (अध्यक्ष), तेज बहादुर सप्रू (कानूनी विशेषज्ञ), अली इमाम, सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू (जो युवा राष्ट्रवादी धड़े का दबाव बना रहे थे)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इस रिपोर्ट में पहली बार मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) (जैसे अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता), केंद्र में उत्तरदायी शासन, भाषाई प्रांतों और एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की रूपरेखा रखी गई, जो हमारे वर्तमान संविधान का आधार बनी[cite: 8]। परंतु, रिपोर्ट की मुख्य मांग 'डोमिनियन स्टेटस' (ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन) पर कांग्रेस की युवा पीढ़ी (जवाहरलाल और सुभाष) असहमत थी, वे 'पूर्ण स्वतंत्रता' चाहते थे[cite: 8]। साथ ही, सांप्रदायिक सीटों के मुद्दे पर मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका विरोध किया और 1929 में अपने '14 सूत्र' रखे, जिससे कांग्रेस और लीग के रास्ते अलग होने लगे[cite: 8]।

कड़ी 17 • वर्ष 1929

लाहौर अधिवेशन (पूर्ण स्वराज का ऐतिहासिक संकल्प)

क्यों हुआ: नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करने के लिए ब्रिटिश सरकार को दिया गया एक वर्ष का अल्टीमेटम दिसंबर 1929 में समाप्त हो रहा था और वायसराय इरविन की घोषणाओं से स्पष्ट था कि अंग्रेज वास्तविक सत्ता सौंपने को तैयार नहीं हैं[cite: 8]। साथ ही विश्व में चल रही क्रांतियों (रूस और तुर्की) का युवा पीढ़ी पर गहरा प्रभाव था[cite: 8]।

कैसे हुआ: दिसंबर 1929 में रावी नदी के तट पर लाहौर में कांग्रेस का ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन हुआ[cite: 8]। गांधी जी के विशेष समर्थन से युवा नेता जवाहरलाल नेहरू को इस अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया गया, जो नेतृत्व परिवर्तन का स्पष्ट संदेश था[cite: 8]। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस के पुराने लक्ष्य को हमेशा के लिए कूड़ेदान में फेंकते हुए "पूर्ण स्वराज" (Complete Independence) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया[cite: 8]। 31 दिसंबर 1929 की आधी रात को रावी के तट पर नेहरू ने तिरंगा झंडा फहराया[cite: 8]।

किसने किया: जवाहरलाल नेहरू (अध्यक्ष) और महात्मा गांधी (मुख्य मार्गदर्शक)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: कांग्रेस ने घोषणा की कि आगामी 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहला 'स्वतंत्रता दिवस' मनाया जाएगा और पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली जाएगी[cite: 8]। इस घटना ने राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्र को पूरी तरह बदल दिया—अब संघर्ष रियायतों के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजों को पूरी तरह बाहर निकालने के लिए था[cite: 8]। इसी ऐतिहासिक 26 जनवरी की स्मृति को अमर रखने के लिए 20 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया[cite: 8]।

कड़ी 18 • वर्ष 1930

दांडी यात्रा एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन (एक मुट्ठी नमक की शक्ति)

क्यों हुआ: पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद जनता को संघर्ष में उतारने के लिए एक व्यावहारिक और प्रभावी मुद्दे की आवश्यकता थी[cite: 8]। गांधी जी ने इसके लिए 'नमक' को चुना, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने नमक उत्पादन पर पूर्ण एकाधिकार कर रखा था और उस पर भारी टैक्स लगा रखा था[cite: 8]। समुद्र के पानी से बने नमक पर भी टैक्स देना पड़े, इसे गांधी ने गरीबों पर सबसे क्रूर आर्थिक बोझ और अन्याय माना, जो हिंदू, मुस्लिम, अमीर, गरीब सबको समान रूप से प्रभावित करता था[cite: 8]।

कैसे हुआ: वायसराय इरविन को अपनी 11 सूत्री मांगें भेजने और कोई जवाब न मिलने पर गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 चुने हुए अनुशासित स्वयंसेवकों के साथ समुद्रतटीय गाँव दांडी के लिए मार्च शुरू किया[cite: 8]। 24 दिनों में लगभग 390 किलोमीटर की दूरी तय कर, 5 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और 6 अप्रैल 1930 की सुबह समुद्र तट पर नमक उठाकर प्रतीकात्मक रूप से ब्रिटिश कानून को भंग कर दिया[cite: 8]। इसके साथ ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन की आग फैल गई[cite: 8]। लोगों ने टैक्स देने से मना कर दिया, जंगलात कानूनों को तोड़ा और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल (जिन्होंने गुजरात में यात्रा से पहले संगठन तैयार किया), सरोजिनी नायडू (जिन्होंने गांधी की गिरफ्तारी के बाद धरसाना नमक डिपो पर सत्याग्रह का नेतृत्व किया), और खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम प्रांत में 'लाल कुर्ती दल'/खुदाई खिदमतगार के माध्यम से आंदोलन चलाया)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: आंदोलन इतना व्यापक था कि ब्रिटिश सरकार घबरा गई और उसने 90,000 से अधिक भारतीयों को जेल में डाल दिया[cite: 8]। धरसाना में निहत्थे सत्याग्रहियों पर ब्रिटिश लाठीचार्ज की बर्बरता की रिपोर्ट जब अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने वैश्विक मीडिया में छापी, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश साम्राज्य की नैतिक वैधता पूरी तरह ध्वस्त हो गई[cite: 8]। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन वैश्विक चर्चा का विषय बन गया[cite: 8]।

कड़ी 19 • वर्ष 1931

गांधी-इरविन समझौता (दिल्ली समझौता)

क्यों हुआ: सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण देश में प्रशासनिक और व्यापारिक गतिविधियां ठप हो चुकी थीं[cite: 8]। प्रथम गोलमेज सम्मेलन का कांग्रेस द्वारा बहिष्कार किए जाने के कारण वह पूरी तरह विफल रहा था[cite: 8]। ब्रिटिश सरकार समझ चुकी थी कि कांग्रेस और गांधी के बिना भारत के संवैधानिक सुधारों पर कोई भी चर्चा निरर्थक है[cite: 8]।

कैसे हुआ: वायसराय लॉर्ड इरविन ने गांधी जी को बिना शर्त जेल से रिहा किया और वार्ता का निमंत्रण दिया[cite: 8]। दिल्ली में कई दिनों की लंबी बातचीत के बाद 5 मार्च 1931 को 'गांधी-इरविन समझौता' संपन्न हुआ[cite: 8]। इसके तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करना और लंदन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया[cite: 8]। सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों (जिन पर हिंसा का आरोप नहीं था) को रिहा करने, तटीय क्षेत्रों में नमक बनाने की छूट देने और कुर्क संपत्तियां वापस करने का वादा किया[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इतिहास में पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य को झुककर कांग्रेस के साथ 'बराबरी के स्तर' (Equal Footing) पर बैठकर समझौता करना पड़ा, जिसने कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति को सर्वोच्च स्थापित कर दिया[cite: 8]। परंतु, यह समझौता देश के भीतर अत्यंत विवादास्पद भी रहा, क्योंकि गांधी जी ब्रिटिश सरकार से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग को मनवाने में असफल रहे, जिसके कारण युवाओं और वामपंथी धड़े (नेहरू और सुभाष) में गहरा असंतोष पैदा हुआ[cite: 8]। मार्च 1931 के कराची अधिवेशन में गांधी जी को काले झंडे दिखाए गए[cite: 8]।

कड़ी 20 • वर्ष 1932

कम्युनल अवॉर्ड एवं पूना पैक्ट (सामाजिक न्याय बनाम राष्ट्रीय एकता)

क्यों हुआ: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने दलितों (Depressed Classes) के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की, जिस पर गांधी जी असहमत थे और सम्मेलन बिना किसी ठोस निर्णय के विफल हो गया[cite: 8]। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अपनी पुरानी 'फूट डालो और राज करो' की नीति का अंतिम अस्त्र प्रयोग किया[cite: 8]।

कैसे हुआ: 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने 'कम्युनल अवॉर्ड' (साम्प्रदायिक पंचाट) की घोषणा की, जिसके तहत मुस्लिमों, सिखों, ईसाइयों के साथ-साथ दलितों को भी हिंदू समाज से अलग मानते हुए पृथक निर्वाचन पद्धति दे दी गई[cite: 8]। यरवदा जेल (पुणे) में बंद गांधी जी ने इसे हिंदू समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने और अस्पृश्यता उन्मूलन के आंदोलन को समाप्त करने की ब्रिटिश चाल माना और इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन (Fast unto Death) शुरू कर दिया[cite: 8]। पूरे देश में भारी तनाव फैल गया[cite: 8]। अंततः, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचारी की मध्यस्थता से 24 सितंबर 1932 को गांधी और डॉ. आंबेडकर के बीच ऐतिहासिक 'पूना पैक्ट' संपन्न हुआ[cite: 8]।

किसने किया: डॉ. बी.आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी (हस्ताक्षरकर्ता)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: पूना पैक्ट के तहत दलितों के लिए 'पृथक निर्वाचन पद्धति' को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया (राष्ट्रीय एकता की रक्षा हुई), परंतु इसके बदले प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई (सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ) और 'संयुक्त निर्वाचन पद्धति' (Joint Electorate) को अपनाया गया[cite: 8]। हमारे वर्तमान संविधान में जो अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण (Article 330 व 332) की व्यवस्था है, उसकी वैधानिक नींव इसी पूना पैक्ट में रखी गई थी[cite: 8]। डॉ. आंबेडकर ने इस पर कहा था कि उन्होंने गांधी के जीवन की रक्षा हेतु भारी नैतिक दबाव में यह समझौता किया है[cite: 8]।

कड़ी 21 • वर्ष 1935

भारत शासन अधिनियम, 1935 (संविधान का ब्लूप्रिंट)

क्यों हुआ: तीनों गोलमेज सम्मेलनों की विफलता और साइमन कमीशन की रिपोर्ट के बाद ब्रिटिश सरकार भारत में एक स्थायी प्रशासनिक और संवैधानिक ढाँचा खड़ा करना चाहती थी ताकि साम्राज्यवादी नियंत्रण भी बना रहे और भारतीयों का असंतोष भी शांत हो सके[cite: 8]।

कैसे हुआ: ब्रिटिश संसद ने अगस्त 1935 में यह ऐतिहासिक और अत्यंत विस्तृत अधिनियम पारित किया, जिसमें 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थीं[cite: 8]। इसकी तीन मुख्य विशेषताएं थीं: 1. एक 'अखिल भारतीय संघ' (Federal System) की स्थापना का प्रस्ताव (जो रियासतों के शामिल न होने से कभी लागू नहीं हो सका), 2. केंद्र में द्वैध शासन (Diarchy) लागू करना, और 3. प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) लागू करना, जिसके तहत प्रांतों को स्वतंत्र शासन का अधिकार मिला[cite: 8]।

किसने किया: ब्रिटिश संसद द्वारा पारित[cite: 8]। कांग्रेस और नेहरू ने इसकी आलोचना करते हुए इसे "अनेक ब्रेकों वाली परंतु इंजन-रहित कार" कहा, फिर भी 1937 के प्रांतीय चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: इस अधिनियम के तहत 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में अपनी सरकारें बनाईं, जिससे भारतीयों को वास्तविक प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हुआ[cite: 8]। सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि हमारे वर्तमान भारतीय संविधान के लगभग 60 से 70% अनुच्छेद और प्रशासनिक ढाँचा (जैसे संघीय न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, राज्यपाल का पद, आपातकालीन प्रावधान) सीधे इसी 1935 के अधिनियम से लिए गए हैं[cite: 8]। अतः यह आधुनिक भारतीय राजव्यवस्था का मुख्य ब्लूप्रिंट सिद्ध हुआ[cite: 8]।

कड़ी 22 • वर्ष 1940

अगस्त प्रस्ताव (विश्व युद्ध का संकट और ब्रिटिश नीति)

क्यों हुआ: सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ[cite: 8]। वायसराय लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल घोषित कर दिया, जिसके विरोध में कांग्रेस के सभी प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया[cite: 8]। युद्ध में जर्मनी के हाथों ब्रिटेन की नाजुक स्थिति को देखते हुए भारतीयों का सैन्य और वित्तीय सहयोग प्राप्त करना अंग्रेजों की विवशता बन गई थी[cite: 8]।

कैसे हुआ: वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को राष्ट्रीय आंदोलन के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसे 'अगस्त प्रस्ताव' कहा जाता है[cite: 8]। इसमें पहली बार अंग्रेजों ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि "भारत का संविधान बनाना मुख्य रूप से स्वयं भारतीयों का अधिकार और जिम्मेदारी है" और युद्ध के बाद एक संविधान सभा के गठन तथा भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' देने का वादा किया गया[cite: 8]।

किसने किया: वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो[cite: 8]। कांग्रेस ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया, क्योंकि वे डोमिनियन स्टेटस से बहुत आगे 'पूर्ण स्वतंत्रता' की मांग पर अड़े थे[cite: 8]। नेहरू ने कहा कि डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा "दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह मृत" हो चुकी है[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: यद्यपि प्रस्ताव विफल रहा, परंतु विधिक रूप से पहली बार ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों द्वारा स्वयं संविधान निर्माण की मांग को स्वीकार किया[cite: 8]। इसके विरोध में गांधी जी ने अक्टूबर 1940 में 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' प्रारंभ किया, जिसके पहले सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे और दूसरे जवाहरलाल नेहरू बने[cite: 8]।

कड़ी 23 • वर्ष 1942

क्रिप्स मिशन एवं भारत छोड़ो आंदोलन (स्वतंत्रता का अंतिम महासंग्राम)

क्यों हुआ: विश्व युद्ध में जापानी सेना तेजी से भारत की सीमाओं (म्यांमार) की ओर बढ़ रही थी, और अमेरिका व चीन ब्रिटिश सरकार पर दबाव बना रहे थे कि वे भारतीयों को वास्तविक सत्ता सौंपकर युद्ध में उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त करें[cite: 8]। इस दबाव में मार्च 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में 'क्रिप्स मिशन' भारत आया, परंतु इसके प्रस्तावों में पाकिस्तान की छिपी हुई मांग और युद्ध के बाद के खोखले वादे थे, जिसे गांधी ने "एक ढहते हुए बैंक का उत्तर-तिथीय चेक" (Post-Dated Cheque on a failing bank) कहकर खारिज कर दिया[cite: 8]।

कैसे हुआ: क्रिप्स मिशन की विफलता से उपजी हताशा के बीच, 8 अगस्त 1942 को बंबई के गवालिया टैंक मैदान (क्रांति मैदान) से गांधी जी ने अपने जीवन का अंतिम और सबसे बड़ा जन आंदोलन—भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) शुरू किया और देश को नारा दिया: "करो या मरो" (Do or Die)[cite: 8]। ब्रिटिश सरकार ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए 9 अगस्त की सुबह 'ऑपरेशन थंडरबोल्ट' के तहत गांधी, नेहरू, पटेल सहित कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को एक साथ गिरफ्तार कर लिया[cite: 8]। नेतृत्वविहीन होने के बाद यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह (Spontaneous Revolution) में बदल गया[cite: 8]। युवाओं और छात्रों ने रेलवे लाइनें उखाड़ दीं, डाकघर जला दिए और बलिया (चित्तू पांडे), सतारा (वाई.बी. चव्हाण) और तामलुक में समानांतर सरकारों (Parallel Governments) की स्थापना की[cite: 8]। इसी समय सुभाष चंद्र बोस ने नजरबंदी से भागकर 1943 में सिंगापुर में आज़ाद हिन्द फौज (INA) की कमान संभाली और सैन्य मोर्चे पर अंग्रेजों को चुनौती दी[cite: 8]।

किसने किया: महात्मा गांधी (आह्वानकर्ता), जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली और उषा मेहता (जिन्होंने भूमिगत रहकर आज़ाद हिंद रेडियो से आंदोलन चलाया), और नेताजी सुभाष चंद्र बोस (सैन्य मोर्चा)[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: यद्यपि इस आंदोलन को भारी सैन्य दमन से दबा दिया गया, परंतु इसने ब्रिटिश साम्राज्य की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी[cite: 8]। युद्ध के बाद जब 1945 में आईएनए के अफसरों (शाहनवाज खान, प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों) पर लाल किले में मुकदमा चला, तो पूरी ब्रिटिश भारतीय सेना की निष्ठा डगमगा गई, जिसका परिणाम 1946 का शाही नौसेना विद्रोह बना[cite: 8]। अंग्रेजों को समझ आ गया कि अब भारतीय सैनिकों के बल पर भारत को गुलाम रखना असंभव है[cite: 8]।

कड़ी 24 • वर्ष 1946 से 1950

कैबिनेट मिशन, भारत का विभाजन एवं संविधान का निर्माण

क्यों हुआ: विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन में लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली सत्ता में आए, जो भारत को स्वतंत्रता सौंपने के पक्ष में थे[cite: 8]। भारत में बढ़ रहे सैन्य विद्रोहों और सांप्रदायिक दंगों के कारण सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण अंग्रेजों की मजबूरी बन चुका था[cite: 8]।

कैसे हुआ: मार्च 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट के तीन मंत्रियों (पैथिक लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर) का 'कैबिनेट मिशन' भारत आया[cite: 8]। इसकी सिफारिश पर भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन हुआ, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को सच्चिदानंद सिन्हा की अस्थायी अध्यक्षता में संसद के केंद्रीय कक्ष में हुई[cite: 8]। 11 दिसंबर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष चुने गए और 13 दिसंबर 1946 को नेहरू द्वारा प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' ही हमारी प्रस्तावना का आधार बना[cite: 8]। इसी बीच जिन्ना की हठधर्मिता और 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) के कारण हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के बाद, माउंटबेटन योजना के तहत भारत का विभाजन स्वीकार करना पड़ा और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ[cite: 8]। संविधान सभा की सबसे महत्वपूर्ण प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर बनाए गए, जिन्हें अपनी अद्वितीय विधिक विद्वत्ता के कारण 'भारतीय संविधान का मुख्य शिल्पकार' (Chief Architect) कहा जाता है[cite: 8]।

किसने किया: डॉ. बी.आर. आंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल (जिन्होंने 562 रियासतों का ऐतिहासिक एकीकरण किया) और संविधान सभा के सभी 299 विद्वान सदस्य[cite: 8]।

क्या प्रभाव पड़ा: कुल 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन के कड़े परिश्रम, 11 सत्रों और व्यापक बहसों के बाद तैयार किए गए विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को पूर्णतः लागू कर भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना[cite: 8]। भारत ने शुरुआत से ही 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' देकर दुनिया के सामने लोकतंत्र की अनूठी मिसाल पेश की[cite: 8]।

🏆 मुख्य परीक्षा परीक्षक समीक्षा पत्रक (Final Topper Sheet): आरएएस मुख्य परीक्षा के इतिहास खंड में पूरे अंक प्राप्त करने का मूल मंत्र है—तथ्य + वैचारिक निरंतरता (Concept)[cite: 8]। 1885 की स्थापना से लेकर 1950 के संविधान लागू होने तक की यह पूरी शृंखला यह स्पष्ट करती है कि हमारा संविधान किसी एकाकी घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह 65 वर्षों के लंबे स्वतंत्रता संघर्ष के नैतिक मूल्यों, कुर्बानियों और प्रशासनिक परिपक्वता का कानूनी संहिताबद्ध रूप (Constitutional Codification) था[cite: 8]। उत्तर लिखते समय हमेशा कोटेशन (जैसे नेहरू, सुभाष, मॉर्ले के कथन) और विधिक अनुच्छेदों की कड़ियों को आपस में जोड़ें[cite: 8]। यही वह दृष्टिकोण है जो एक साधारण उत्तर को 'टॉपर के उत्तर' में तब्दील करता है[cite: 8]।